एक कविता – अभी तो सावन की कजरी घटाएँ है बाक़ी

poem i am waiting for you

अभी तो सावन की कजरी घटाएँ है बाक़ी
बदन को छू कर चुभने वाली हवाएँ है बाक़ी

जानता हूं तुम ना हो इस डगर में
मगर याद करती तुम्हे फिज़ाएं है बाक़ी

गरजते बादलो से डर, कैसे कान ढ़कती थी तुम
ढूंढती है तुम्हे सुकूं देने को निदाये1 है बाक़ी

हिज़्र2 का कोई सबब3 तुमने बताया नही
अब हम खा़मोश है ज़माना बताये है बाक़ी

आज इतनी बारिश हुयी एक ज़लज़ला है आया
मेरे भीतर उठते सैेलाब की वबाए4 है बाक़ी

तुम्हारे हिस्से का ख़ुलूस5 ख़त्म हो गया हो मगर
तमाम6 ना होने वाली मेरी वफ़ाए है बाक़ी

 

 

1=आवाज़ें. 2=जुदाई. 3=कारण. 4=महामारी
5=प्रेम 6=ख़त्म

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